भारतीय विदेश नीति एवं वैश्विक मंचों पर बढ़ती भूमिका: एक सैद्धांतिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन
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Published on: Mar 31, 2026
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Co-Authors: डॉ प्रीति वर्मा
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DOI: CIJE20261111360_61
KANTA SAINI
कान्ता सैनी, शोधार्थी, महर्षि अरविन्द विश्वविद्यालय , जयपुर
Co-Author 1
डॉ प्रीति वर्मा
एसोसिएट प्रोफेसर, महर्षि अरविन्द विश्वविद्यालय , जयपुर
21वीं सदी में वैश्विक शक्ति-संतुलन में तीव्र परिवर्तन, बहुध्रुवीयता का उदय, आर्थिक परस्पर निर्भरता, जलवायु संकट और सामरिक प्रतिस्पर्धा ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति को पुनर्परिभाषित किया है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत की विदेश नीति ने “गुटनिरपेक्षता” से “रणनीतिक स्वायत्तता” तथा “बहु-संरेखण” की ओर संक्रमण किया है। भारतीय विदेश नीति अब वैचारिक तटस्थता से हटकर 'इंडिया फर्स्ट' (भारत प्रथम) और यथार्थवादी सक्रियता की ओर बढ़ी है, जो रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक विकास और "विश्वबंधु" के रूप में वैश्विक मंचों पर नेतृत्व (जैसे G20, ग्लोबल साउथ) पर केंद्रित है। यह नीति अब सुरक्षा, तकनीक (DPI), और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर स्वतंत्र व कठोर निर्णय लेने में सक्षम है, जो इसे बहुध्रुवीय विश्व में एक प्रमुख शक्ति बना रही है। यह शोध गुणात्मक-विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है। इसमें आधिकारिक दस्तावेज़, नीति वक्तव्य, शिखर सम्मेलन घोषणाएँ, और विद्वानों के लेखों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। निष्कर्षतः, भारत आज वैश्विक शासन, आर्थिक कूटनीति, जलवायु नेतृत्व और सामरिक संतुलन के क्षेत्र में एक उभरती निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है।