ब्रह्म विवाह संस्कृति के संदर्भ में जॉन ग्रेगर मेंडल के नियमों की प्रासंगिकता
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Published on: Mar 31, 2026
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DOI: CIJE20261111328
Dr. Ramawatar Godara
सहायक प्राध्यापक, शिक्षा संकाय उच्च अध्ययन शिक्षा संस्थान (मानित् विश्वविद्यालय) गाँ.वि.मंदिर सरदारशहर (चूरु)राज. व्हॉट्सएप- 9351046609 ई-मेल ramawatargodara@gmail.com
यह अध्ययन भारतीय ब्राह्म विवाह संस्कृति के संदर्भ में जॉन ग्रेगर मेंडल के आनुवंशिक सिद्धांतों की प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है। इसका मुख्य उद्देश्य परंपरागत सांस्कृतिक मान्यताओं और आधुनिक ळमदमजपबे के बीच संबंध स्थापित करना है। ब्राह्म विवाह में योग्य, संस्कारी तथा समान गुणों वाले वर-वधू के चयन पर विशेष बल दिया जाता था, जिसे अप्रत्यक्ष रूप से “आनुवंशिक शुद्धता” (हमदमजपब चनतपजल) की अवधारणा से जोड़ा जा सकता है। अध्ययन का पहला उद्देश्य आनुवंशिक शुद्धता और मेंडल के नियमों-विशेषतः गुणों के पृथक्करण तथा स्वतंत्र वर्गीकरण का तुलनात्मक विश्लेषण करना है। इससे यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार माता-पिता के गुण संतानों में स्थानांतरित होते हैं और उनके संयोजन से नई विशेषताएँ विकसित होती हैं। दूसरा उद्देश्य “स्वस्थ संतति” की अवधारणा का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार स्वस्थ संतति केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक, बौद्धिक तथा आनुवंशिक संतुलन भी शामिल है। इस संदर्भ में जीन, पर्यावरण तथा सामाजिक परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। तीसरा उद्देश्य परंपरागत सांस्कृतिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय को समझना है। यह अध्ययन दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय समाज में विवाह चयन के जो मानदंड अपनाए गए थे, वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप थे। अंततः, यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ब्राह्म विवाह प्रणाली केवल सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि उसमें निहित सिद्धांत आधुनिक आनुवंशिकी से संबंधित हैं। अतः पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से स्वस्थ, संतुलित एवं जागरूक समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।