भारतीय ज्ञान परंपरा का बदलता स्वरुप एक विश्लेषण

Satyapal Singh
Assistant Professor, Dipartment of Education, Childrens Academy B.Ed College Alwar Rajasthan

Co-Author 1

Mrs. Rani Yadav
Research Scholar, Lord's University, Alwar
प्राचीन भारत में शिक्षा का क्रमबद्ध इतिहास ईसा पूर्व छठी शताब्दी से ही मिलता है। यह ज्ञान, परंपराओं और प्रथाओं का स्रोत है, जो मानव के सर्वांगीण्र विकास पर केंद्रित है। भारतीय ज्ञान प्रणाली का सीधा सा अर्थ है ज्ञान के प्रति प्रेम अर्थात भारतीय दर्शन में यहां के मानव समुदाय में प्रत्येक स्तर पर सांसारिक ज्ञान, या आत्मिक ज्ञान अर्थात परलौकिक ज्ञान की समझ विकसित करना है। भारतीय दर्शन दर्शनशास्त्र का सबसे पुराना स्कूल है और वेद प्राचीन हिंदू ग्रंथों में सबसे पुराने हैं और मौखिक वैदिक परंपरा 10,000 ईसा पूर्व की है जिनमें अधिकांश शिक्षा मौखिक रूप से दी जाती थी और छात्र कक्षा में सीखी गई बातों को याद रखते और उन पर मेडिटेशन विधि से मनन करते थे। वैदिक युग में लिंगभेद नहीं था महिलाएं भी पुरुषों की तरह ही शिक्षण पेशे में भाग लेती थीं। इस काल में वेदों, इतिहास, पुराणों, व्याकरणए गणित, ब्रह्म विद्या, निरुक्ति, भूगोल, खगोल विज्ञान, नृत्य और संगीत शिक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण थी। बौद्ध शिक्षा को प्राचीन हिंदू शिक्षा प्रणाली का एक चरण माना जा सकता है, लोगों का जीवन लोभ, मोह, माया, अहंकार से मुक्त था सभी लोग जीवन के निर्धारित मूल्य के साथ आश्रम व्यवस्था में संस्कारित जीवन व्यतीत करते थे उस समय भी बहुत सारे आविष्कार और भूगोल शोध चिकित्सा खगोल विज्ञान और गणित के क्षेत्र में हुए थे जो आज भी पूरे विश्व में चर्चा का विषय बने हुए है उन्ही शोधों और अनुसंधानों के कारण हमने आज के औद्योगिक तकनीकी युग में प्रवेश किया तकनीकी औद्योगिक विकास में तो शायद हमारे देश ने खूब विकास किया है जिससे आज हमारे देश में इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर, दुनिया के बड़े-बड़े विकसित देशों की अर्थव्यवस्था में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं लेकिन हमारे देश के अंदर कुछ लोगों या वर्गों में पश्चिमी शिक्षा से आई भौतिकवाद, उपभोक्तावाद की शिक्षा ने लोगों में प्रतिस्पर्धा की दौड, ईर्ष्या और घृणा की भावना को जन्म दिया। जिससे लोगों के व्यवहार में भ्रष्टाचार, अमानवीय व्यवहार, गैर कानूनी तरीके अपनाने जैसे विचारों का देश में प्रचलन हुआ। जो दीमक की तरह, लोहे में जंग की तरह, गेहूं में घुन की तरह हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था के मूल्यों जैसे आपसी प्रेम, सहानुभूति, दया, धर्म, एवं सहयोग और देश के प्रतिष्ठित संस्थानों, न्याय के मंदिरों, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका जैसी देश की कानूनी संस्थाओं को कमजोर कर रहा हैं वर्तमान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों से पता चलता है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है एक अध्ययन से पता चलता है कि छात्र शिक्षक संबंधों में कमी, विद्यालयों के व्यवहार में भी कमी देखी गई। यदि विद्यार्थी जीवन से ऊपर जाकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद वर्तमान समय में दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, कार्य स्थल पर शोषण, भ्रष्टाचार, भेदभाव जैसे अपराधों में वृद्धि दर्ज की गई है जिससे साफ पता चलता है कि कहीं ना कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था में कमी है हो सकता है कि हम व्यावसायिक शिक्षा बहुत अच्छी दे रहे हैं लेकिन ऐसी शिक्षा प्रणाली के साथ मूल्य आधारित संस्कारित व्यवहार का ह्रास हो रहा है। इसलिए हमारे केंद्र सरकार ने भारतीय ज्ञान परंपरा को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का अनिवार्य हिस्सा बनाया जिसमें इसे विज्ञान, तकनीकी, चिकित्सा, कला और वाणिज्य संकाय के अंतर्गत सभी विद्यार्थियों को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाए जाने की सिफारिश शैक्षिक नियामक संस्थाओं से की है। मैं इस शोध के माध्यम से बताना चाहता हूं कि यदि परंपरागत शिक्षा के कुछ मूल्यों जैसे गुरुकुल के विद्यार्थी के गुण, गुरु के कर्तव्य, गुरुकुल के नियम और कक्षा के स्तर अनुसार वैदिक पाठ्यक्रम को NEP- 2020 के अनुसार कक्षाओं में पढ़ाया जाए। या धीरे धीरे उस पाठ्यक्रम को छोटी कक्षाओं में लागू किया जाए तो आने वाले भविष्य में 15 सालों में हमें संस्कारवान योग्य विद्यार्थी मिलेंगे जो देश दुनिया के हर कोने में अपनाए समाज और देश का नाम रोशन करेंगे और शिक्षण छात्र संबंधों में सुधार होगा। एवं धीरे धीरे सभी विभागों में संयमित जीवन जीने वाले, मानव कल्याण की भावना, और देशहित सर्वोपरि की भावना रखने वाले नागरिकों का निर्माण होगा। और हमारा देश पुनः विश्व गुरु के पद पर सुशोभित होगा। Key Word:- भारतीय ज्ञान प्रणाली, वैदिक परंपरा, बौद्ध, जैन, वर्तमान शिक्षा, विद्या, कोष, विद्यार्थी, कर्म, औद्योगिक, तकनीकी युग, देश, पाठ्यक्रम, विद्या, विद्यार्थी शिक्षक संबंध

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