कागज़ पर नियमित, व्यवहार में अनुपस्थित: बी.एड. डिग्री का व्यावसायीकरण, पाठ्यचर्या की प्रभावहीनता और नियमित प्रशिक्षण की भूमिका (नाटकीय प्रस्तुति सहित)
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Published on: Sep 30, 2026
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DOI: CIJE20261131425
Ashwini Kumar 'Sukrat'
प्रोफेसर (एड-हॉक) महर्षि वाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन दिल्ली विश्वविद्यालय
दो वर्षीय बी.एड. कार्यक्रम 2015-16 सत्र से लागू हुआ, पर शिक्षक-शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़े प्रश्न इसके बाद भी बने रहे। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित जस्टिस जे.एस. वर्मा आयोग ने 2012 में दर्ज किया था कि अधिकांश एकल शिक्षक-शिक्षा संस्थान गंभीर शिक्षक-शिक्षा का प्रयास नहीं कर रहे थे और शुल्क के बदले डिग्री दे रहे थे। 2018 से 2026 तक के संसदीय उत्तर, नियामक आदेश, न्यायालयी निर्णय से जुड़ी रिपोर्ट और खोजी समाचार-रिपोर्टें बताती हैं कि अवधि बढ़ने के बाद भी उपस्थिति, विद्यालय-इंटर्नशिप, संकाय और निरीक्षण की कागज़ी पूर्ति की समस्या बनी रही। दूसरी ओर, दो वर्षीय कार्यक्रम पर हुए अध्ययनों की एक समीक्षा के अनुसार अधिकांश विद्यार्थी-शिक्षकों का दृष्टिकोण इस कार्यक्रम के प्रति अनुकूल नहीं रहा। यह लेख इन दोनों प्रवृत्तियों को दो वर्षीय बी.एड. पाठ्यचर्या की प्रभावहीनता की समस्या के रूप में देखता है। अध्ययन पूर्व शोध, नीति-दस्तावेज़ों, संसदीय अभिलेखों और प्रकाशित रिपोर्टों के समेकित विश्लेषण पर आधारित है। इसमें कोई साक्षात्कार या मैदानी सामग्री शामिल नहीं है। विश्लेषण के बीच व्यंग्यात्मक-संगीतमय नाटक 'चले मुरारी-त्रिपुरारी शिक्षक बनने' रखा गया है, जो इन्हीं प्रवृत्तियों को दो मित्रों की कथा में रचता है। त्रिपुरारी सुविधा-पैकेज वाले निजी संस्थान से डिग्री लेता है, जबकि मुरारी एक सरकार अनुदानित शिक्षा महाविद्यालय में नियमित प्रशिक्षण से गुज़रता है। विश्लेषण से यह निष्कर्ष उभरता है कि पाठ्यचर्या की प्रभावहीनता उसकी बनावट से अधिक उसके क्रियान्वयन और ग्रहण से पैदा होती है। विद्यालय-इंटर्नशिप, चिंतनशील डायरी, सतत आकलन, पाठ-योजना और क्रियात्मक शोध जैसे घटक जब कागज़ी उत्पाद या औपचारिकता बन जाते हैं, तब दो वर्ष की अवधि भी गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं कर पाती। इन घटकों का उद्देश्य नियमित और पेशेवर शिक्षण-प्रशिक्षण से ही साकार होता है। मुख्य शब्द: बी.एड. पाठ्यचर्या, शिक्षक-शिक्षा, डिग्री का व्यावसायीकरण, जस्टिस वर्मा आयोग, NCTE विनियम 2014, विद्यालय-इंटर्नशिप, चिंतनशील अभ्यास, कला-आधारित शोध