डिजिटल युग में बाल साहित्य की प्रासंगिकता
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Published on: Sep 30, 2026
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DOI: CIJE20261131447
Ramniwas Bhambu
शोधार्थी - हिंदी विभाग, श्री बलदेव राम मिर्धा महाविद्यालय नागौर
साहित्य का सृजन मानव चेतना और विकास के विभिन्न धरातलों पर निरंतर पल्लवित होता रहा है। बोध के स्तर पर जहाँ दार्शनिक साहित्य और बुद्धि के स्तर पर वैचारिक साहित्य व्यक्ति को परिपक्व बनाता है, वहीं बाल साहित्य बालक के 'आरंभिक बोध' और 'विकसित होती बुद्धि' के अनुसार रचित वह साहित्य है जो उसमें नैतिक मूल्यों, व्यावहारिक कूटनीति तथा लोक-व्यवहार की नींव रखता है। वर्तमान डिजिटल क्रांति ने बच्चों के पठन-पाठन की आदतों, कल्पनाशीलता और एकाग्रता अवधि को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। प्रस्तुत शोध पत्र में डिजिटल युग के परिप्रेक्ष्य में बाल साहित्य की प्रासंगिकता का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। यह शोध पत्र एक ओर जहाँ ऑडियो-विजुअल, एनीमेशन, ई-बुक्स और डिजिटल पुस्तकालयों के माध्यम से बाल साहित्य के नए अवसरों और वैश्विक पहुँच को रेखांकित करता है; वहीं दूसरी ओर अत्यधिक स्क्रीन टाइम, अवांछित सामग्री और पारंपरिक बाल पत्रिकाओं के अस्तित्व-संकट जैसी चुनौतियों पर प्रकाश डालता है। अंततः यह शोध पत्र प्रिंट और डिजिटल माध्यमों के 'हाइब्रिड मॉडल' तथा 'सह-पठन' की संस्कृति को अपनाकर बाल साहित्य की शाश्वत प्रासंगिकता को बनाए रखने के व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। बीज शब्द: बाल साहित्य, डिजिटल युग, बोध एवं बुद्धि, स्क्रीन टाइम, हाइब्रिड मॉडल, प्रासंगिकता।