नगरपालिका वित्तीय प्रशासन में प्रमुख समस्याएँ एवं चुनौतियाँ : राजस्थान के विशेष सन्दर्भ में
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Published on: Sep 30, 2026
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DOI: CIJE20261131443
Rakesh Kumar Yadav
Assistant Professor ( Public Administration ) Government Arts college, Sikar
भारत में 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने नगरीय स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करते हुए उन्हें "स्वशासन की संस्थाओं" के रूप में प्रतिष्ठित किया, किंतु तीन दशक बाद भी इन निकायों का वित्तीय प्रशासन अपनी संवैधानिक परिकल्पना से दूर है। प्रस्तुत शोध पत्र नगरपालिका वित्तीय प्रशासन की संरचनात्मक, विधिक, संस्थागत एवं प्रशासनिक समस्याओं का विश्लेषण करता है, जिसमें राजस्थान राज्य को विशेष सन्दर्भ-बिंदु के रूप में लिया गया है। अध्ययन नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की राजस्थान सम्बन्धी लेखापरीक्षा रिपोर्टों, भारतीय रिजर्व बैंक की नगरपालिका वित्त रिपोर्ट, पन्द्रहवें एवं सोलहवें वित्त आयोग की अनुशंसाओं तथा राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 के प्रावधानों पर आधारित प्रलेखीय विश्लेषण (documentary analysis) की पद्धति अपनाता है। विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि राजस्थान की नगरपालिकाओं की कुल प्राप्तियों में स्वयं के राजस्व का अंश केवल 20 से 29 प्रतिशत के मध्य रहा है, जबकि 71 से 79 प्रतिशत आय अनुदानों पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त कर-राजस्व का अंश कुल राजस्व के मात्र 2.66 से 6.52 प्रतिशत तक सीमित रहा है। शोध का निष्कर्ष है कि समस्या केवल संसाधनों की कमी की नहीं, अपितु करारोपण-स्वायत्तता के अभाव, लेखांकन एवं अंकेक्षण तंत्र की दुर्बलता, आँकड़ा-प्रबंधन की विफलता तथा जवाबदेही-तंत्र की निष्क्रियता की सम्मिलित संरचनात्मक समस्या है।