सजातीय विवाह और जाति-सत्ता का पुनरुत्पादन: भारत में अंतरजातीय विवाह के विरोध और दबावपूर्ण विवाह के हिंसक परिणामों का गुणात्मक अध्ययन
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Published on: Jun 30, 2026
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DOI: CIJE20261121380
Ashwini Kumar 'Sukrat'
सहायक प्रोफेसर (शिक्षा) महर्षि वाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली Email- ashwini.edu21@gmail.com, Mobile-9643273515
सार-संक्षेप यह शोधपत्र समकालीन भारत में सजातीय विवाह की संस्था के माध्यम से जाति-सत्ता के पुनरुत्पादन की पड़ताल करता है। अध्ययन का केंद्र यह है कि जाति केवल सार्वजनिक भेदभाव, पेशागत विभाजन, धार्मिक पहचान या राजनीतिक प्रतिनिधित्व से नहीं टिकती, बल्कि विवाह, रिश्तेदारी, वंश, सम्मान, संपत्ति और शुद्धता की सामाजिक धारणाओं के नियंत्रण से भी बनी रहती है। भारतीय समाचार स्रोतों, न्यायिक निर्णयों, सरकारी योजनाओं और नीति-दस्तावेज़ों पर आधारित गुणात्मक सामग्री-विश्लेषण यह दिखाता है कि अंतरजातीय विवाह को परिवार और बिरादरी अक्सर निजी चयन नहीं, बल्कि जाति-सीमा के उल्लंघन के रूप में देखते हैं। इसलिए ऐसी वैवाहिक पसंद कई बार हत्या, हमला, सामाजिक बहिष्कार, जुर्माना, धमकी और प्रशासनिक दबाव में बदल जाती है। हालिया मामलों को जोड़ते हुए लेख यह भी जाँचता है कि जब परिवार या जाति-समुदाय किसी युवती को इच्छा-विरुद्ध विवाह या मंगनी की ओर धकेलते हैं, तब अस्वीकारित प्रेम-संबंध और सुरक्षित निकास की अनुपस्थिति कभी-कभी पति या मंगेतर के विरुद्ध हिंसा में बदल सकती है। लेख पाँच विश्लेषणात्मक समूहों में मामलों को व्यवस्थित करता है: पहला, निम्न-जाति या दलित पुरुष और प्रभावशाली जाति की स्त्री के विवाह पर हिंसक विरोध; दूसरा, प्रभावशाली जाति के पुरुष और निम्न-जाति स्त्री के विवाह पर विरोध, जिसमें उत्पीड़ित समुदायों के भीतर से आने वाली सजातीय निगरानी भी शामिल है; तीसरा, विवाह-पूर्व संबंधों और निकटता की निगरानी; चौथा, खाप पंचायतों, जाति पंचायतों और सामाजिक बहिष्कार की सामुदायिक दंड-व्यवस्था; और पाँचवाँ, दबावपूर्ण विवाह, अस्वीकारित प्रेम और हिंसक निकास के हालिया प्रकरण। आंबेडकर, बुर्दियू और ग्राम्शी के वैचारिक आधार के साथ लेख यह तर्क विकसित करता है कि जाति-उन्मूलन के लिए अंतरजातीय विवाह को केवल निजी साहस या आर्थिक प्रोत्साहन के प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षा, सहमति, वैधानिक निकास, सामाजिक मान्यता और राज्यीय उत्तरदायित्व के प्रश्न के रूप में समझना आवश्यक है। मुख्य शब्द: जाति; सजातीय विवाह; जाति-अंतर्विवाह; अंतरजातीय विवाह; दबावपूर्ण विवाह; वैवाहिक सहमति; सम्मान-आधारित अपराध; सामाजिक बहिष्कार; खाप पंचायत; आंबेडकर