हिंदी और उर्दू: एक भाषा, दो मानकीकृत शैली—ऐतिहासिक – साम्प्रदायिक संघर्षों की परिणति
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Published on: Mar 31, 2026
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DOI: CIJE20261111345
Ashwini Kumar 'Sukrat'
अश्विनी कुमार 'सुकरात' सहायक प्रोफेसर (एड-हॉक) महर्षि वाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन दिल्ली विश्वविद्यालय
सारांश यह शोध-पत्र हिंदी और उर्दू को दो पूर्णतः पृथक भाषाओं के रूप में नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी के दो मानकीकृत रजिस्टर के रूप में समझने का प्रस्ताव रखता है। इस दृष्टिकोण का आधार यह है कि दोनों भाषाओं की वाक्य-रचना, व्याकरणिक संरचना, क्रिया-प्रणाली और सामान्य बोलचाल का आधार व्यापक रूप से साझा है, जबकि उनका प्रमुख अंतर उच्च रजिस्टर की शब्दावली, लिपि और औपचारिक मानकीकरण में अधिक स्पष्ट होता है (Misra Sharma, 2012; Prasad & Virk, 2012)। अध्ययन दस्तावेज़ी विश्लेषण और लक्षित साहित्य-समीक्षा पर आधारित है। इसमें गांधी के भाषा-विचार, संविधान सभा की बहसें, संविधान के भाषा-संबंधी अनुच्छेद, राजभाषा अधिनियम 1963, तथा कुछ प्रमुख भाषावैज्ञानिक और समाजभाषावैज्ञानिक स्रोतों को साथ पढ़कर विश्लेषित किया गया है (Gandhi, 1925, 1947; Constituent Assembly of India, 1946, 1949a, 1949b)। इस विश्लेषण से यह संकेत मिलता है कि बोलचाल की साझा हिंदुस्तानी धारा को संवैधानिक केंद्र में बनाए रखने के बजाय देवनागरी हिंदी को राजभाषा के रूप में संस्थागत किया गया और उसके विकास की दिशा को मुख्यतः संस्कृत की ओर उन्मुख किया गया। इसी के साथ अंग्रेज़ी विधि, न्यायपालिका और उच्च प्रशासन में प्रभावी बनी रही, जिससे एक ओर व्यापक जन-बोधगम्यता का प्रश्न उभरता है और दूसरी ओर अंग्रेज़ी की संस्थागत श्रेष्ठता भी मजबूत होती दिखाई देती है (Ministry of External Affairs, n.d.; Department of Official Language, n.d.; Department of Justice, Government of India, 2022)। इस प्रकार हिंदी-उर्दू का प्रश्न केवल भाषिक भिन्नता का विषय नहीं रह जाता; यह मानकीकरण, राज्य की भाषा-नीति, सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक संप्रेषण की संरचना से भी गहराई से जुड़ जाता है। मुख्य शब्द: हिंदुस्तानी; हिंदी–उर्दू; मानकीकृत रजिस्टर; लिपि-राजनीति; राजभाषा-नीति; भारतीय संविधान; अनुच्छेद 343; अनुच्छेद 351; अनुच्छेद 348; अंग्रेज़ी की संरचनात्मक निरंतरता; भाषा-मानकीकरण; लोकतांत्रिक