रवीन्द्र कालिया का कथेतर साहित्य

LALIT SHRIMALI
डॉ ललित कुमार श्रीमाली (सहायक आचार्य) हिन्दी विभाग, जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय) उदयपुर (राज.)

Co-Author 1

पीरा राम चौधरी (शोधार्थी)
हिन्दी विभाग,जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय) उदयपुर (राज.)

Co-Author 2

डॉ ललित कुमार श्रीमाली (शोध निर्देशक)
हिन्दी विभाग, जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय) उदयपुर (राज.)
शोध सारांश :- रवीन्द्र कालिया के संदर्भ में यह कहना कठिन है कि वे एक बड़े कहानीकार है अथवा उसने भी उम्दा संस्मरणकार। वे बड़े उपन्यासकार है अथवा सर्वकालिक महत्त्व के ऐसे संपादक जिन्होंने हिंदी साहित्य के लिए एक पूरी की पूरी पीढ़ी तैयार की है। उनके जो संस्मरण है वे हिन्दी साहित्य की अप्रतिम उपलब्धि है। उन्होंने बड़ी ही शिद्दत के साथ अपने सृजन के साथियों एवं अग्रणों के बारे में लिखा है। उनकी कथेतर की प्रमुख पुस्तक ‘गालिब छूटी शराब’ का मुरीद तो हिंदी साहित्य का हर पाठक है। उन्होंने अपने युग की यथार्थ अभिव्यक्ति एवं संबंधित व्यक्तियों के चरित्रोद्घाटन की जिस कला का प्रयोग अपने सस्ंमरणों में किया है वह हिन्दी कथेतर साहित्य की एक महत्वपूर्ण देन है। हम प्रो. आर. डी. शंकर के शब्दों में कह सकते है कि- ‘‘संस्मरणकार की सजग एवं सूष्म दृष्टि ही संस्मरण विधा को बड़ा बनाती है। संस्मरणकार ने अब तक जो संस्मरण लिखे हैं उन सस्ंमरणों के आधार पर कह सकते हैं कि ‘गालिब छुटी शराब’ एवं ‘सृजन के सहयात्री’ में बहुत ही मार्मिक जीवन प्रसंगों का चित्रण किया है।’’ हम कह सकते हैं कि उनका व्यक्तित्य बहुआयामी था। हमारे समय के ऐसे रचनाकार के रूप में हमारे सामने थे जिन्होने एकाधिक विधा में मील के पत्थर स्थापित किए हैं। पारिभाषिक शब्दावली:- साहित्य, कथेतर, संस्मरण, आत्मकथात्मक

Highlights