Environmental Protection Education Inherent in the Vedic System of rites

HASTU RANI
Hastu Rani Ph.D scholar, education, Hastu Rani W/o Omprakash godara , near gram panchayat, alai, nagaur 341001

Co-Author 1

Dr. Minakshi Mishra
Principal Bharti T.T. college, Sriganganagar-335001 (Raj.)
वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण विश्व स्तर का प्रमुख मुद्दा है। 'पर्यावरण' परि और आवरण दो शब्दो से मिलकर बना है, अर्थात् चारों ओर से घिरा हुआ। पर्यावरण में जल मंडल, स्थल मंडल और वायु मंडल सम्मिलित है। यदि इनमें से कोई एक घटक का भी संतुलन बिगड़ जाए तो पर्यावरण प्रभावित होता है। जिसका प्रभाव जीव जगत पर भी पड़ता है। वेदों में सम्पूर्ण पर्यावरण को प्रकृति का आवरण माना गया है। अथर्ववेद में पर्यावरण के लिए वृतावृत, अभिवर, अवृत्तः, परिवृत शब्दों का प्रयोग किया गया था। प्रकृति के पंच महाभूत पृथ्वी, जल, हवा, अग्नि, आकाश जैविक एवं भौतिक पर्यावरण की रचना करते है। वेदों और उपनिषदों में पंच महाभूतों को दैवीय शक्ति माना गया है। वर्तमान विज्ञान को भी प्रकृति के इन रहस्यों तक पहुँचने के लिए लम्बे दौर से गुजरना पड़ा। वैदिक मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व प्रकृति के इन रहस्यो और उपयोगिता का पता लगा लिया था। शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ अपेक्षित नियम बनाये गये है। यह नियम ही संस्कार है। वैदिक संस्कार पद्धति के अन्तर्गत गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुण्डन, कर्णवेध विद्यारंभ, उपनयन, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास और अन्त्येष्टि संस्कार आते हैं। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म पूर्व से लेकर मरणोत्तर तक अलग-अलग समय पर किये जाते हैं। भारतीय संस्कार परम्परा में दैनिक जीवन में पर्यावरण को आध्यात्मिकता से जोड़ते हुए पर्यावरण संरक्षण को प्रेरित करने का कार्य करती है। अतः वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण को महत्त्व दिया जाने लगा। वेदों में प्राकृतिक तत्त्वों के अमर्यादित और अनावश्यक उपयोग के दुष्परिणामों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया था कि पर्यावरण असन्तुलन के दुष्परिणाम सम्पूर्ण विश्व के लिए हानिकारक है। मुख्य शब्द वैदिक भारत, पर्यावरण संरक्षण, जल मंडल, स्थल मंडल, वायुमंडल, जैविक, भौतिक, सांस्कृतिक, पंचमहाभूत ।

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