समान बाई की रचनाओं में भक्ति-भावना
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Published on: Sep 30, 2026
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Co-Authors: डॉ ललित कुमार श्रीमाली (शोध निर्देशक )
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DOI: CIJE20261131441_42
LALIT SHRIMALI
सुहासिनी कविया , शोधार्थी, (हिंदी विभाग) जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय ) उदयपुर (राज.)
Co-Author 1
डॉ ललित कुमार श्रीमाली (शोध निर्देशक )
सहायक आचार्य, (हिंदी विभाग) जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय ) उदयपुर (राज.)
शोध सारांश :- राजस्थान की भक्ति परंपरा में स्त्रियों का योगदान अत्यंत समृद्ध और क्रांतिकारी रहा है। मध्यकाल में इन महिला संतों ने न केवल ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम (भक्ति) का प्रदर्शन किया, बल्कि तत्कालीन पुरुष-प्रधान रूढ़िवादी समाज और जाति-पाति के बंधनों को तोड़कर आध्यात्मिक व सामाजिक समानता की अलख जगाई। भक्तिमति समान बाई (1825-1885) राजस्थान के अलवर क्षेत्र में जन्मी एक महान कृष्णभक्त कवयित्री थीं, जिन्हें 'मत्स्य की मीरा' भी कहा जाता है। समान बाई के पदों में कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह, समर्पण और शरणागति की भावना प्रमुख है। उनके पदों में भक्त और भगवान के बीच प्रेमपूर्ण संबंध दिखाई देता है। वे सरल राजस्थानी भाषा में कृष्ण की भक्ति और उनके दर्शन की उत्कट इच्छा व्यक्त करती हैं। उनकी रचनाओं में भक्ति-भाव अत्यंत सरल, आत्मीय और लोकभाषा में व्यक्त हुआ है। साहित्य में उनका योगदान प्रेम, समर्पण, और दास्य भाव से परिपूर्ण है। उनके द्वारा रचित मंगलगीत (समान बाई के सोले) आज भी राजस्थान के चारण समाज में विवाह व मांगलिक अवसरों पर गाए जाते हैं। उनकी भक्ति में माधुर्य भाव (ईश्वर को प्रियतम मानना) और दास्य भाव (सेवक भाव) का अनूठा मिश्रण है। राजस्थानी साहित्य की भक्ति-परंपरा में अनेक महिला कवयित्रियों ने अपनी अनुभूतियों, आध्यात्मिक चेतना और आराध्य के प्रति समर्पण को लोकभाषा में अभिव्यक्त किया है। इस परंपरा में समान बाई का नाम विशेष महत्त्व रखता है। समान बाई की रचनाओं में कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह, दास्य-भाव, आत्मसमर्पण और ईश्वर-कृपा की आकांक्षा प्रमुख रूप से दिखाई देती है। उनकी भक्ति केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें व्यक्तिगत अनुभूति, प्रेम की तीव्रता और लोकजीवन की सहज अभिव्यक्ति का सुंदर समन्वय मिलता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में समान बाई की रचनाओं में व्यक्त भक्ति-भावना, विरह-वेदना, कृष्ण-प्रेम, शरणागति तथा लोकभाषा के स्वरूप का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, उनकी काव्य-दृष्टि में नारी-मन की संवेदनशील अभिव्यक्ति को भी रेखांकित किया गया है।