शिक्षा, राजनीति और आलोचना का संकट: कार्टून विवाद के बहाने आलोचनात्मक चिन्तन पर अंकुश
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Published on: Dec 31, 2025
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DOI: CIJE20251041285
Ashwini Kumar 'Sukrat'
लेखक - अश्विनी कुमार “सुकरात” सहायक प्रोफेसर (एड-हॉक) महर्षि वाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन दिल्ली विश्वविद्यालय
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यह शोध आलेख 2012 में घटित एनसीईआरटी कार्टून विवाद को आधार बनाकर भारतीय शैक्षणिक प्रणाली, आलोचनात्मक चिंतन, और विचारधारात्मक असहिष्णुता के संकट की गहराई से पड़ताल करता है। आलेख का केन्द्रीय तर्क यह है कि यह विवाद एक कार्टून से कहीं अधिक एक विचारधारा की असहिष्णु प्रतिक्रिया का प्रतीक बन गया, जिसने न केवल शैक्षणिक सामग्री की स्वायत्तता को प्रभावित किया, बल्कि आलोचना पर आधारित लोकतांत्रिक शिक्षा के उद्देश्यों को भी चुनौती दी। इस संदर्भ में लेख यह विश्लेषण करता है कि कैसे एक ऐतिहासिक व्यंग्यचित्र—जो डॉ. भीमराव आम्बेडकर और जवाहरलाल नेहरू को संविधान निर्माण की प्रक्रिया में दर्शाता है—एक राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया और उसे दलित अस्मिता के अपमान के रूप में प्रचारित किया गया। लेख में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या भावनात्मक राजनीति के उभार ने आलोचनात्मक शिक्षा की संभावना को सीमित कर दिया है, और यह भी कि आज की शिक्षा प्रणाली में विचारों की बहुलता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कितनी सुरक्षित है। आलेख का उद्देश्य शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और सामाजिक विचारकों के लिए यह चिंतन प्रस्तुत करना है कि क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जो प्रश्नों से डरता है, आलोचना से घबराता है और बहस को टालने की प्रवृत्ति को संस्थागत बना चुका है।