रेणु के रिपोर्ताज : संवेदनाओं के सजीव दस्तावेज

Chandra Prakash Sharma
डॉ. चन्द्र प्रकाश शर्मा सहायक आचार्य- हिंदी राजकीय महाविद्यालय, दौसा (राज.) मेल आई डी – cpshell.prashant@gmail.com मो. - 9414638256

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कुवेर सिंह मीना
सह आचार्य- हिंदी राजकीय महाविद्यालय, दौसा (राज.) मेल आई डी – kskaima2000@gmail.com मो. - 9414202550
शोध निष्कर्ष - रेणु ने अपने रिपोर्ताजों में कथा साहित्य की तरह आंचलिकता को बनाए रखा है। उन्होंने रिपोर्ताजों को शास्त्रीय शिल्पगत सीमाओं में बाँधा नहीं है इसलिए उनके रिपोर्ताजों में घटनाओं के वर्णन के लिए खुला अवकाश मिलता है। इसी का पूरा फायदा उठाते हुए रेणु अपने अंचल के पूरे के पूरे परिवेश का सजीव चित्रण करते हुए पाठक के समक्ष हर वर्ग की संवेदनाओं को चित्रित किया है।हिंदी में रांगेय राघव, धर्मवीर भारती, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, निर्मल वर्मा जैसे अनेक लेखकों ने रिपोर्ताज लिखें हैं लेकिन रेणु के रिपोर्ताज अन्य लेखकों से अलग रंग रूप वाले हैं, स्वयं उनके अपने रिपोर्ताजों की यदि तुलना की जाए तो उनके बीच भी उसकी अनेक भंगिमाएँ दिखाई देती हैं। उनके रिपोर्ताजों की कलात्मक संरचना विशिष्ट है। उनमें व्यंग्य है, नाटकीयता है और संवेदनाओं का अविरल प्रवाह भी। कथा, डायरी, आत्मकथा, संस्मरण, रेखाचित्र तथा निबंध जैसी नाना प्रकार की विधाएँ उनके यहाँ आकर उनकी संवेदना से समरस और एकाकार होकर रिपोर्ताज का निर्माण करती हैं। उनका ‘ऋणजल धनजल’ रिपोर्ताज संग्रह तो उनके अपने और हिंदी रिपोर्ताजों में भी बेजोड़ है।

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