आधुनिक वैश्विक युग में मानव अधिकार और भारतीय दर्शन

Mrs. Priyadarshni
PH.D Scholar, Maharaja Surajmal Brij University, Bharatpur, Rajasthan.
आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में मानव अधिकारों की अवधारणा एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका उद्देश्य प्रत्येक मनुष्य को स्वतंत्रता, समानता तथा सम्मानपूर्ण जीवन प्रदान करना है। मानव अधिकारों की जड़ें प्राचीन काल से ही भारतीय दर्शन में विद्यमान रही हैं। यद्यपि मानवाधिकारों की अवधारणा का व्यवस्थित विकास वर्तमान युग में 20वीं शताब्दी में संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से हुआ, तथापि इसके मूल तत्व भारत की प्राचीन चिंतन परंपरा में पहले से ही निहित रहे हैं। आज संपूर्ण विश्व प्राकृतिक संतुलन से छेड़छाड़ तथा प्राकृतिक नियमों के उल्लंघन के कारण एक चिंताजनक स्थिति में पहुँच चुका है। ऐसी परिस्थितियों में मानव मूल्यों, जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों के संरक्षण के साथ-साथ नैतिकता पर आधारित तकनीक का प्रयोग आवश्यक हो गया है, जिससे विनाश से बचा जा सके। वैश्वीकरण की अवधारणा भी भारतीय दर्शन के लिए नवीन नहीं है। भारतीय दर्शन में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की संकल्पना प्राचीन काल से ही विद्यमान रही है, जिसका आशय है कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाए तो निवास तथा आवागमन का अधिकार भी इसी सिद्धांत पर आधारित है। भारत में प्रचलित मूल्यों की सजीव अभिव्यक्ति इस तथ्य से भी होती है कि मुण्डकोपनिषद में वर्णित “सत्यमेव जयते” को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया है। वर्तमान समय में शिक्षा को भी एक महत्वपूर्ण मानव अधिकार माना गया है, किंतु यह भी ध्यान देने योग्य है कि केवल शिक्षा का अधिकार पर्याप्त नहीं है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण तथा नैतिक शिक्षा की उपलब्धता भी आवश्यक है। भूलना नहीं चाहिए कि भारत प्राचीन समय से ही शिक्षा के क्षेत्र में विश्वगुरु रहा है। नालंदा विश्वविद्यालय में 10,000 से भी अधिक शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे। आर्थिक रूप से असक्षम लोगों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करना प्राचीन समय से वर्तमान समय तक भारत में प्रचलित है। भारतीय संस्कृति या यूँ कहें कि भारतीय दर्शन प्राचीन काल से ही मानव अधिकारों पर बल देता आया है, जबकि पश्चिमी देशों में यह अवधारणा लगभग 100 वर्षों में ही अस्तित्व में आई है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय दर्शन के लिए मानव अधिकारों की अवधारणा सदैव से ही केंद्र बिंदु रही है। आज मानवाधिकारों में निहित जीवन का अधिकार बौद्धिक अधिकारों की स्वतंत्रता, गुलामी से मुक्ति, शोषण से सुरक्षा, लैंगिक काम करने और काम के बदले उचित वेतन लेने जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकार भी शामिल हैं। आधुनिक युग में इंटरनेट तक पहुँच, निजता का अधिकार और डिजिटल स्वतंत्रता जैसे नए मानवाधिकारों पर चर्चा बढ़ती जा रही है। आधुनिक न्याय का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को पूरी सुरक्षा प्रदान करना है ताकि अपने व्यक्तिगत अधिकारों का पूर्ण विकास कर सके। आधुनिक युग में मानवाधिकार केवल सैद्धांतिक नहीं बल्कि वास्तविक जीवन जीने के लिए एक अनिवार्य उपकरण की तरह तकनीकी प्रगति के साथ-साथ सुरक्षित रखने की आवश्यकता है। वर्तमान वैश्विक युग में मानवाधिकारों का संरक्षण ही मानवता की सबसे बड़ी चुनौती है। जिस विश्व निरंतर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।

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