हिंदी उपन्यासों में आदिवासियों की जीवन शैली

LALIT SHRIMALI
डॉ ललित कुमार श्रीमाली सहायक आचार्य (शोध निर्देशक) जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय ) उदयपुर (राज.)

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सतीश चंद्र जोशी
(शोधार्थी) जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय ) उदयपुर (राज.) 313001
शोध सारांश:-आर्थिक उदारीकरण के कारण विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों में नियमों को कमजोर करने वाले कानूनों का निर्माण होने से खनन के क्षेत्र से जुड़ी कंपनियाँ आज जंगलों के निवासियों को वहाँ से खदेड़ रही हैं। ये निवासी जो आदिवासी कहलाते हैं, इनके सामने अपनी अस्मिता का संकट खड़ा हो गया है। हिंदी के कुछ उपन्यासकारों ने अपना ध्यान इनकी समस्याओं पर भी केंद्रित किया है। आदिवासियों से जब इनका जंगल, इनकी जमीन ही छीनी जा रही है तो इनकी अस्मिता पर संकट आ गया हैं उपन्यासों में यह बात सामने आ रही है कि इन पर यह संकट दो रूपों में आ रहा है। एक तो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सत्ता से गठजोड़ करके इन्हें समाप्त कर देना चाहती है। दूसरा यह कि विभिन्न धर्मों के प्रचारक इनका विलय अपने धर्म में कर लेना चाहते हैं। इन दोनों संकटों से आदिवासियों को उबरना होगा अन्यथा इनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

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